PM Modi Israel Visit: 9 साल बाद इज़राइल पहुंचे मोदी, जब-जब भारत संकट में था तब कैसे ढाल बना यह दोस्त देश

PM Modi Israel Visit

जब भी भारत की विदेश नीति में भरोसेमंद दोस्तों की बात होती है, तो इज़राइल का नाम अपने आप सामने आ जाता है। PM Modi Israel Visit केवल एक औपचारिक कूटनीतिक दौरा नहीं है, बल्कि यह उस रिश्ते की याद दिलाता है जो युद्ध, संकट और वैश्विक दबावों के दौर में भी मजबूती से खड़ा रहा। लगभग नौ साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह इज़राइल दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब मध्य पूर्व तनाव की आग में झुलस रहा है और दुनिया की नजर भारत के हर कदम पर है।

यह दौरा बताता है कि भारत अपनी रणनीतिक दोस्ती को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में भी निभाता है। PM Modi Israel Visit दरअसल बीते छह दशकों की उस दोस्ती का विस्तार है, जो मुश्किल वक्त में परखी गई।

PM Modi Israel Visit और भारत-इज़राइल रिश्तों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत और इज़राइल के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में बने, लेकिन दोस्ती की नींव उससे बहुत पहले रखी जा चुकी थी। राजनीतिक मजबूरियों के कारण यह रिश्ता लंबे समय तक पर्दे के पीछे रहा, मगर भरोसा कभी कमजोर नहीं पड़ा। आज PM Modi Israel Visit उसी रिश्ते को खुले मंच पर और मजबूत करने की कोशिश है।

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1962 की जंग: जब इज़राइल ने बिना नाम के मदद भेजी

1962 की भारत-चीन जंग भारत के लिए एक बड़ा झटका थी। उस दौर में कई देश खुलकर भारत के समर्थन में नहीं आए, लेकिन इज़राइल ने अलग रास्ता चुना। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि तत्कालीन इज़राइली नेतृत्व ने भारत को हथियारों की खेप भेजी, वह भी बिना किसी पहचान के, ताकि भारत के अरब देशों से रिश्ते खराब न हों। यही वह भरोसा था, जिसने आने वाले वर्षों में रिश्तों को मजबूत किया।

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1965 और 1971 की लड़ाइयां: चुपचाप निभाई गई दोस्ती

1965 और 1971 के युद्धों में भी इज़राइल भारत के साथ खड़ा रहा। हथियारों और गोला-बारूद के रूप में मिली यह मदद भले ही सार्वजनिक न हुई हो, लेकिन भारतीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए यह बेहद अहम थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि 1971 की जीत के पीछे कई अदृश्य सहयोगियों का योगदान था, जिनमें इज़राइल भी शामिल था।

कारगिल युद्ध 1999: तकनीक जिसने युद्ध की दिशा बदली

1999 का कारगिल युद्ध भारत के सैन्य इतिहास का निर्णायक मोड़ था। दुश्मन ऊंची पहाड़ियों पर छिपा था और सटीक हमलों की जरूरत थी। ऐसे वक्त में इज़राइल ने भारत को लेज़र-गाइडेड बम और UAVs मुहैया कराए। रक्षा मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तकनीकी मदद ने युद्ध का रुख भारत के पक्ष में मोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। यही कारण है कि आज PM Modi Israel Visit को केवल कूटनीति नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है।

PM Modi Israel Visit

रक्षा साझेदारी: भरोसे से बना मजबूत गठबंधन

आज भारत, इज़राइल के सबसे बड़े रक्षा खरीदारों में शामिल है। बराक-8 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, AWACS, हेरॉन ड्रोन और बॉर्डर सिक्योरिटी तकनीक भारतीय सेना की ताकत बन चुकी है। यह साझेदारी केवल हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त अनुसंधान और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रही है। PM Modi Israel Visit के दौरान इस सहयोग को और आगे बढ़ाने पर बातचीत तय मानी जा रही है।

व्यापारिक रिश्ते: 200 मिलियन से 6.5 अरब डॉलर तक

1992 में जब औपचारिक रिश्ते बने थे, तब भारत-इज़राइल व्यापार केवल 200 मिलियन डॉलर का था। आज यह बढ़कर करीब 6.5 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। कृषि तकनीक, जल संरक्षण, स्टार्टअप और हाई-टेक सेक्टर में दोनों देश एक-दूसरे के अहम साझेदार बन चुके हैं। एशिया में चीन के बाद भारत, इज़राइल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।

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PM Modi Israel Visit पर विपक्ष की आपत्ति

इस दौरे की टाइमिंग को लेकर कांग्रेस ने सरकार को घेरा है। पार्टी नेता जयराम रमेश ने इसे दोहरा रवैया बताया। हालांकि कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत इज़राइल, ईरान और अरब देशों के बीच संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रहा है।

दुनिया की नजर मोदी-नेतन्याहू मुलाकात पर

प्रधानमंत्री मोदी और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मुलाकात और संयुक्त प्रेस वार्ता पर वैश्विक नजरें टिकी होंगी। रक्षा, व्यापार और तकनीकी सहयोग से जुड़े कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर की संभावना है। ऐसे में PM Modi Israel Visit आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।

दोस्ती जो वक्त के साथ और गहरी हुई

कुल मिलाकर, PM Modi Israel Visit उस दोस्ती की अगली कड़ी है, जिसने 1962 से लेकर कारगिल तक हर कठिन समय में भारत का साथ दिया। बदलते वैश्विक हालात में यह रिश्ता केवल मजबूत ही नहीं, बल्कि और ज्यादा अहम होता जा रहा है।

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Disclaimer

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों, ऐतिहासिक तथ्यों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी कूटनीतिक या राजनीतिक निष्कर्ष को अंतिम सत्य न माना जाए।